प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पश्चिम एशिया में जारी संकट, कच्चे तेल की बढ़नी कीमतों और आर्थिक दबाव के बीच नरेंद्र मोदी ने डीजल पेट्रोल की खपत काम करने की कपिल की थी । पीएम मोदी की अपील के बाद सरकार में सिर्फ स्टार पर ईंधन बचाने की महिम सी छिड़ती दिख रही है । पीएम की इस अपील के बाद गृहमंत्री अमित शाह ने अपने काफिले को आधे से भी कम कर दिया है । गृहमंत्री अमित शाह को गृह मंत्रालय की जेड प्लस सिक्योरिटी प्राप्त है जिसमें करीब दर्जन भर गाड़ियां शामिल होती थी।
अमित शाह के काफिले में अब गाड़ियों की संख्या घटकर सिर्फ पांच रह गई है। यह कदम केवल एक प्रशासनिक बदलाव नहीं बल्कि एक व्यापक संदेश भी है सत्ता में बैठे लोग भी कठिन आर्थिक दौर में जिम्मेदारी सजा करने को तैयार है। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष ने वैश्विक स्तर पर ऊर्जा आपूर्ति को प्रभावित किया है। हारमोंस स्ट्रेट जैसे महत्वपूर्ण मार्गो पर संकट के चलते कच्चे तेल की कमतों में तेज उछाल आया है इसका सीधा असर भारत जैसे देश पर पड़ा है ।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसी को देखते हुए देशवासियों से संयम बरतने और संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग की अपील की थी। यह अपील केवल आम आदमियों के लिए नहीं, बल्कि सरकार और प्रशासन के लिए भी एक संकेत थी की वह अपने स्तर पर सादगी अपनाए। गृहमंत्री अमित शह ने इस अपील को गंभीरता से लेते हुए अपने काफिले में शामिल गाड़ियों की संख्या 50% से अधिक कम कर दी है । अमित शाह के काफिले में अब केवल पांच गाड़ियां चल रही है। यह कदम कई मायनों में महत्वपूर्ण है।
गृहमंत्री का पद देश की अंतरिक्ष सुरक्षा से जुड़ा होता है। और उनके काफिले में सुरक्षा मानकों का पालन सर्वोच्च प्राथमिकता होती है। इसके बावजूद गाड़ियों की सख्या में इतनी बड़ी कटौती यह दर्शाती है कि सुरक्षा और साध्वी सादगी के बीच संतुलन बनाने की कोशिश की जा रही है । मैसेज यह है कि देश के बड़े मंत्री पश्चिम एशिया की आर्थिक संकट के बीच इस तरीके के गाड़ियों के कफिला में कमी करके तेल की बढ़ती कमतों के बीच ईंधन की खपत में कमी की जा सकती है। प्रधानमंत्री के काफिले की बात करे , तो सुरक्षा के लिहाज से बहुत कुछ नहीं बताएंगे ।
संदेश क्या है?
गृहमंत्री अमित शाह का अपना काफिला छोटा करना केवल एक प्रतीकात्मक कम नहीं है। यह सरकार के भीतर एक व्यापक बदलाव का संकेत देता है। सूत्रों का कहना है कि इससे तीन बड़े संदेश निकलते है । 1 – साझा सझेदारी: आर्थिक संकट के समय केवल जनता ही नहीं बल्कि सरकार भी जिम्मेदारी निभा रही है। 2- सादगी की संस्कृति: सत्ता के शीर्ष स्तर पर सादगी को बढ़ावा दिया जा रहा है । 3- व्यवस्था में सुधार: यह संकेत है कि सुरक्षा से समझौत किए बिना भी संसाधनों का बेहतर उपयोग संभव है।