सुप्रीम कर्ट ने अपने एक फैसले में कहा है कि मस्जिदों से जुड़ी जिन जमीनों को ‘ सेवा इनाम’ कहा जाता है वह वक्फ संपत्ति का हिस्सा होती है और उन्हें बेचा नहीं जा सकता ।
शीर्ष अदालत ने आंध्र प्रदेश के एक मामले में फैसला देते हुए कहा है कि यह बात निर्विवाद है धार्मिक या धर्मार्थ कामों के लिए ‘सेवा इनाम’ के तौर पर दी गई जमीनें दान की गई संपत्ति का रूप ले लती है और उन पर एक सार्वजनिक या धार्मिक ट्रस्ट का अधिकार हो जाता है , जिससे उन्हें बेचने या किसी और को देने पर रॉक लग जाती है।
सुप्रीम कोर्ट ने रद्द किया आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट का फैसला
न्यायमूर्ति एमएम सुंदेश और मसीह की पीठ ने आंध्रप्रदेश वक्फ बोर्ड की अपील पर यह फैसला सुनते हुए आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट का फैसला रद्द कर वक्फ ट्रिब्यूनल के फैसले को बहाल कर दिया है ।
क्या था यह मामला ?
मौजूदा मामला आंध्र के कुरनूल जिले की 3 एकड़ जमीन का था जिसमें मुख्य प्रश्न यही था की क्या यह जमीन वक्फ संपत्ति (सेवा इनाम ) मानी जाएगी जो बुडढ़ा बुडढ़ी मस्जिद और अस्तबल की धार्मिक सेवाओं के लिए दी गई थी । इसलिए इसे बेचा नहीं जा सकता था या फिर वह जमीन निजी संपत्ति थी जिसे सेल डीड के जारी कानूनी तौर पर बेचा जा सकता है।
मामले में मूलवादी जानकी बसप्पा मैं वक्त ट्रिब्यूनल में वाद दाखिल कर 1985 और 1996 में हुई सेल डीड के आधार पर मलिकना हक जताते हुए जमीन के शांतिपूर्ण इस्तेमाल का अधिकार मांगा था और किसी को भी उसमें दखल न देने पर स्थाई रोक मांगी थी।

दूसरी ओर वक्फ बोर्ड ने जमीन को वक्फ संपत्ति बताते हुए दलील दी थी कि यह जमीन रूप से धार्मिक कार्यों के लिए दी गई थी और यह सेवा इनाम के रूप में दर्ज है जिसे बेचा नहीं जा सकता वक्फ बोर्ड ने जमीन जमात अहले हदीस को ईदगाह का निर्माण करने के लिए आवंटित कर दी थी।
मामले में अहम सबूत 1945 के बंटवारे का एक कागज बना जिसमें जमीन को सेवा इनाम के तौर पर ही बताया गया था वक्फ ट्रिब्यूनल मैं जानकी बसप्पा का मुकदमा खारिज दिया था।
मामला हाई कोर्ट गया और हाई कोर्ट ने ट्रिब्यूनल का फसला पलटते हुए कहा कि वक्फ बोर्ड जमीन पर मालिकाना हक साबित करने में नाकाम रहा । जिसके बाद वक्फ बोर्ड ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी जिस पर यह फैसला आया है ।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व फैसले में सैयद अली बना एपी वक्फ बोर्ड का जिक्र किया है जिसमें यह स्पष्ट रूप से कहां गया था की धार्मिक या धर्मार्थ सेवाएं प्रदान करने के लिए दी गई जमीन का पूर्ण स्वामित्व किसी व्यक्ति को नहीं मिलता और ऐसी जमीन जो मुसलमान कानून के तहत पवित्र धार्मिक या धार्मिक माने जाने वाले उद्देश्यों के लिए दी जाती है उस संपत्ति को वक्फ का दर्जा दे देती है।
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