कल्पक्कम में प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर ने क्रिटिकलिट हासिल कर ली है । यानी ये रेक्टर खुद ब खुद न्यूक्लीयर रेन रियॅक्शन शुरू कर चुका है यह भारत के लिए बहुत बड़ी उपलब्धि है रूस के बाद अब भारत दुनिया का दूसरा देश बन गया है । अब रिएक्टर अपने आप चलने लगा है ज्यादा ईंधन भी बन रहा है ।
यह उपलब्धि भारत के तीन स्टेज के न्यूक्लीयर प्रोग्राम को नई ऊंचाई पर ले जा रही है । इस प्रोग्राम की कल्पना 1950 के दशक में डॉक्टर होमी भाभा ने की थी । भारत में यूरेनियम कम है लेकिन थोरियम के बड़े भंडार है । इसलिए भाभा ने ऐसा प्रोग्राम बनाया जो थोरियम का इत्तेमाल करके देश को लंबे समय तक सस्ती और साफ उर्जा दे सके ।

क्या है प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर?
कल्पक्कम तमिलनाडु में बना 500 मेगावाट का यह प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर भारत की न्यूक्लीयर कंपनी भाविनी ( भाभा न्यूक्लीयर फ्यूल कॉम्प्लेक्स) ने बनाया है। यह रेक्टर प्लूटोनी -यूरेनियम मिश्रित ईंधन का इस्तेमाल करता है ।इसमें कूलेंट के रूप में तरल सोडियम का उपयोग होता है।
सामान्य न्यूक्लीयर रिएक्टर ईंधन जलाते है लेकिन फॉस्ट ब्रीडर रिएक्टर उनसे ज्यादा ईंधन पैदा करता है । यानी जितना ईंधन खर्च करता है उससे ज्यादा नया फ़िसायल मटेरियल तैयार है जो चेन रिएक्शन चला सके।
क्रिटिकलिट हासिल होने का मतबल है कि अब चेन रियक्सन खुद ब खुद चलने लगा है . रिएक्टर ऊर्जा करने के साथ भविष्य के लिए भी ईंधन स्टोर कर रहा है । यह टेक्नोलॉजी बहुत जटिल है क्योंकि तरल सोडियम को 550 डिग्री तक गर्म रखना पड़ता है कोई भी छोटी गलती पूरे सिस्टम को प्रभावित कर सकती है ।
तीन स्टेज का प्रोग्राम क्यों शुरू किया गया
- पहला : प्रेशराइज्ड हैवी वॉटर रिएक्टर जो उपलब्ध यूरेनियम से बिजली बनाता है
- दूसरा : फास्ट ब्रीडर रिएक्टर का है जो प्लूटोनियम बनाता है थोरियम को u 233 में बदलता है।
- तीसरा : थोरियम बेस्ड रिएक्टर का होगा जो भारत के विशाल थोरियम भंडार का पूरा फायदा उठाया ।